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8 16.02.2006, at 15:07:28 Fullname: दीपिका जोशी Email: divvj@hotmail.com Where are your from?: कुवैत Comments: वेब पर सुरुचिपूर्ण साहित्य को प्रकाशित करना बहुत महत्वपूर्ण काम है. इस दिशा में आप लोगों का प्रयत्न सराहनीय है. बधाई स्वीकारें. Rachna ka Shirshak: 7 16.02.2006, at 14:50:45 Fullname: Rachana Dayal Email: rachana_dayal@yahoo.in.com Where are your from?: USA Comments: सरल जी की कविताएं प्रकाशित कर के हम सामान्य पाठकों का आपने बडा उपकार किया है जिन्हें हिंदी की पुस्तकें प्राप्त करने में कठिनाई होती है. इस प्रकार का सुंदर साहित्य विश्वजाल पर देने के लिए धन्यवाद Rachna ka Shirshak: 6 16.02.2006, at 14:23:23 Fullname: अनूप भार्गव Email: anoop_bhargava@yahoo.com Where are your from?: Princeton , New Jersey , USA Comments: आदरणीय व्योम जी: 'सरल' जी की कविता की समीक्षा करना या उस के बारे में कुछ कहनें के लिये सोचना भी मेरी सामर्थ्य से बाहर की बात है इसलिये मैं उन की कविता के बजाय उस माध्यम की बात करूंगा जिस के कारण मुझे सरल जी को जाननें और पढनें का अवसर मिला । जी हाँ , मैं इन्टरनेट की बात कर रहा हूँ । भारत की माटी से इतनें दूर रह कर हिन्दी पुस्तकों का सरलता से मिलना तो सम्भव नहीं है लेकिन इन्टरनेट नें इस की कमी को बिल्कुल मिटा सा दिया है । पूरा विश्व बहुत छोटा लगनें लगा है । आप नें सरल जी कविताओं और उन के महाकाव्य 'चन्द्र शेखर आज़ाद' को जो 'इन्टरनेट' पर उपलब्ध करानें का शुभ कार्य किया है उस के लिये आप को कोटि कोटि धन्यवाद । मेरा विश्वास है कि धीरे धीरे इसी तरह हिन्दी का समूचा साहित्य ''विश्वजाल' पर उपलब्ध होगा और 'विश्वजाल' साहित्य को जन जन तक पहुँचानें में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा । इस विषय में पहला कदम उठानें के लिये आप बधाई के पात्र हैं । शुभकामनाओं सहित अनूप भार्गव सचिव अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति Rachna ka Shirshak: 5 15.02.2006, at 06:36:40 Fullname: मानोशी Email: cmanoshi@hotmail.com Where are your from?: Canada Comments: डा. व्योम ने बताया कि महाकवि श्री कृष्ण सरल जी का महाकाव्य चंद्र शेखर आज़ाद अंतरजाल पर प्रकाशित हुआ है। लिंक पर जा कर मन जैसे गद-गद हो गया। इस काव्य का प्रकाशन श्री कृष्ण सरल जी की इस महान कृति को सबके सामने लाने और ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक पहुँचाने की दिशा में एक बहुत बडा कदम है। विश्व भर में तकनीकी विकास के साथ ही इंटर्नेट एक बहुत बडा माध्यम बन गया है सहित्यिक आदान-प्रदान का। हिन्दी साहित्य प्रेमी भी हिन्दी साहित्य को उसका सही सम्मान देने में प्रयत्नशील हैं और इसी प्रयत्न के चलते अंतरजाल पर चंद्रशेखर आज़ाद महाकाव्य का प्रकाशन एक बडा मील का पत्थर है । इस महाकाव्य का २६ भागों में यूनिकोड (देवनागरी) में प्रकाशित होना काफ़ी परिश्रम और लगन का सबूत भी देता है। चंद्र शेखर आज़ाद का प्रकाशन न सिर्फ़ हिन्दी साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने का नि:स्वार्थ प्रयास है बल्कि देशभक्त व कवि श्री कृष्ण सरल जी को एक सच्ची श्रद्धान्जलि भी है। मैं उन सब लोगों को अपनी शुभकामनायें भेजती हूँ जिनकी मेहनत और लगन के बिना ये महान कार्य संभव नहीं था। Rachna ka Shirshak: 4 14.02.2006, at 04:08:33 Fullname: प्रत्यक्षा Email: pratyaksha_sinha@yahoo.co.in Where are your from?: भारत Comments: नेट पर महाकवि श्रीकृष्ण सरल का महाकाव्य "चन्द्र शेखर आज़ाद " उपलब्ध कराने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद . इन अनमोल साहित्यिक रचनाओं को नेट पर विस्तार पाते देख कितनी खुशी होती है , यह बयान करना कठिन है. आगे और भी अमूलय रचनाओं को नेट पर , घर बैठे पढने की संभावना और उम्मीद आहलादित करती है. आप सबों को बहुत शुभकामनायें Rachna ka Shirshak: महाकवि श्री कृष्ण सरल 3 12.02.2006, at 13:18:52 Fullname: Atul Arora Email: atula@netzero.com Where are your from?: Philadelphia Comments: अति सुँदर। भारत भूमि से दूर रहने वालो के लिए इन दुर्लभ चित्रो और यशस्वी साहित्य के सोपान सुलभ कराने हेतु साधुवाद। इंटरनेट पर हिंदी के इन अनमोल मोतियों की बढ़ती सँख्या देख हर्ष होता है। Rachna ka Shirshak: saral chetna 2 11.02.2006, at 05:21:09 Fullname: Devi Nangrani Email: devi1941@yahoo.com Where are your from?: U.S.A. Comments: महाकवि श्रीकृष्ण सरल जी का महाकाव्य " चँद्रशेखर आजाद" को इन्टरनेट पर पढने का सौभाग्य मिलेगा यह हमारी खुशकिस्मती है कि हम महान कवि सरल जी की काव्य रचनाओं का रस दुनिया के हर कोने में ले सकते हैं ॥ मान्यवर डा॰ जगदीश व्योम, और हम बाहर विदेश में रहने वालों के दिलों में बसी पूर्णमा वर्मन जी का तहे दिल से आभार मानती हूँ जो इस नेट के जरिये हमको घर बैठे ये अनमोल काव्य सागर के मोती चुगने को मिल जाते हैं॥ डा॰ व्योम द्वारा पोस्ट किये महाकाव्य "चन्द्रशेखर आजाद" और उनकी कविताएँ जो नेट पर हैं, से सरलजी की एक छवि उभर आई है जहन में जहाँ सच में कलम को तलवार बनाकर वे खुद सेनानी स्वरूप हमारे सामने उभर आये है- ''नहीं महाकवि और न कवि ही, लोगों द्वारा कहलाऊँ सरल शहीदों का चारण था, कहकर याद किया जाऊँ ।।'' -श्रीकृष्ण सरल उन का यह मुक्तक मेरी दिल की गहराइयों को छूता गया- "यदि किसी एक के भी हम आँसू पोंछ सके यदि किसी एक भूखे को रोटी जुटा सके, सौभाग्य हमारा, यदि ऐसा कुछ कर पाए अपनेपन का धन यदि हम सब में लुटा सकें।" सच को आईने की जरूरत नहीं पडती सूर्य को उँगली से नहीं ढांपा जाता उसी तरह सरल जी के महाकाव्यों की जगमगाती रौशनी में हम इस सँसार का सच्चा स्वरूप देखने के काबिल बनने की कोशिश में हैं. कोशिश जारी रहेगी...राह मँजिल तो नहीं, पर सफर अँजाम देगा उस मक्सद को॥ काविता के सागर से अँजुली भर हम प्यास न बुझा पाए पर इस मृगतृष्णा की सहरा से खुद को बचा लाये हैं॥ सादर- देवी नागरानी न्यू जर्सी (यू.एस.ए.)से Rachna ka Shirshak: 1 11.02.2006, at 04:50:09 Fullname: Pratysh yadav Email: pysh_123@yahoo.co.in Where are your from?: Hoshangabad Comments: Bal kavita or unkey chitra bahut sunder hain. -Pratyush Rachna ka Shirshak:
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